परशुराम :मातृकुण्डिया

विश्व विख्यात महामानव, अनन्त ओजस्वी, जिनके रक्तारविन्द सदृश्य युगल नयन अहर्निश अग्नि-बाणों की अविरल वर्षा करते थे। शस्त्र एवं शास्त्रधारी रणकौशल-सृजनकत्र्ता का महाप्रयलंकारी परशा जिसकी चमक मानो दामिनी की दमक से भी लक्षाधिक तीक्ष्ण और तीव्रतम धावक जिन्होंने इक्कीस बार क्षत्रिय विहीन सृष्टि के संकल्प को साकार करने का सफलासफल प्रयास किया। उस अद्वितीय पितृ-भक्त का अबुझ रक्त-पिपासु परशा, पितृ-आज्ञा से जब माँ का रक्त भी पी गया तब मातृ-हत्या की पाप-मुक्ति की युक्ति हेतु अति व्यग्र त्रिलोकीनाथ इस देवधरा पर कहाँ-कहाँ नहीं गए, समर भवानी रणचण्डी का प्रिय धाम तीर्थराज मेवाड़ की समग्र पुण्य धरा का एक अद्भुत अंचल जिसने उस समय उस पाप-मुक्ति का कौशल और सामथ्र्य जुटाया, साधना का अन्तिम सोपान सिद्ध हुआ वहीं पर माँ का शीश पीठ से स्वतः अलग हुआ और परमपूज्य परशुराम पाप-मुक्त हुए। उस तीर्थ-स्थल को आज मातृकुण्डिया के नाम से जाना जाता है |

रचनाकार -
कवि अमृत ‘वाणी’
(अमृतलाल चंगेरिया कुमावत)